गायत्री यंत्र

गायत्री यंत्र पाप को नष्ट करने और पुण्य को उदय करने की अद्भुद शक्ति का पुन्ज कहा जाता है। इस यंत्र की       पूजा उपासना करने से इस लोक में सुख प्राप्त होता है एवं विष्णु लोक में स्थान प्राप्त होता है। तथा अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। ओर दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा होती है।माँ गायत्री चारों वेदों की प्राण, सार, रहस्य एवं तन (साम) साम संगीत का यह रथन्तर आत्मा के उल्लास को उद्वेलित करता है जो इस तेज को अपने में धारण करता है उसकी वंश परम्परा तेजस्वी बनती चली जाती है।

उसकी पारिवारिक संतति और अनुयायिओं की श्रृंखला में ऐ से एक बढ़कर तेजस्वी प्रतिभाशाली उत्पन्न होते चले जाते हैं।

यंत्र का उपयोग

साधना चेता क्षेत्र का ऐसा पुरुषार्थ है जिसमें सामान्य श्रम एवं मनोयोग का नियोजन भी असामान्य विभूतियों एवं शक्तियों को जन्म देता है। साधारण स्थिति में हर वस्तु तुच्छ है। यदि गायत्री यंत्र की उपासना द्वारा उसको पूर्ण बनाया जाय तो वह वस्तु उत्कृष्ट बन जाती है।
हमने संसार के कठिन से कठिन कार्य का सदा सहज रूप में कर सकने की सामथ्र्य गायत्री-साधना से ही जुटाई है। हजारो ऋषि-मुनियों, साधकों, महापुरुषों ने इस साधना को बिना सोचे-समझे, बिना प्रयोग-परीक्षण किये नहीं अपनाया है।