यह भगवान षडानन का स्वरूप है इसके देवता भगवान कार्तिकेय हैं इससे धारक की सोई हुई शक्ति जागृति होती हैं। यह विद्या प्राप्ति के लिये श्रेष्ठ है तथा आत्मशक्ति संकल्प शक्ति और ज्ञान शक्ति प्रदान करता है।
षड्वक्तः कार्तिकेयस्तु धारयेद्दक्षिणे भुजे।
भ्रूणाहत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र सशयः।।
षट्मुखी रुद्राक्षा स्वयं कर्तिकेय है। उसको जो मनुष्य अपनी दक्षिण भुजा में धारण करते हैं, वे भू्रणहत्या आदि से लेकर बड़े पापों से छूट जाते हैं। इसमें कुछ संशय नहीं है। गुप्त शत्रु एवं प्रकट शत्रु नष्ट करने हेतु इस रुद्राक्ष का बड़ा भारी महत्त्व है इसलिए कुछ विद्वान इसे ’शत्रुंजय रुद्राक्ष’ भी कहते हैं। यह भी सब प्रकार की अभीष्ट सिद्धि को देने वाला कहा गया है। छःमुखी रुद्राक्ष मिथुन, तुला, मकर लग्न के जातक को यह रुद्राक्ष अत्यधिक लाभ प्रदान करता है।
उपयोग से लाभ
प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष शत्रु के शमन के लिए यह रुद्राक्ष अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसी कारण इसका एक नाम शत्रुंजय भी है
विपत्ति काल में छःमुखी रुद्राक्ष की माला पर जप करने से विपत्ति से छुटकारा मिलता है एवं पीड़ायें नष्ट होती हैं।
बड़े आकार का छःमुखी रुद्राक्ष दाहिनी भुजा पर (पुरुष) धारण करने से बड़े से बड़ा से अपराध का पाप नष्ट होता है।
छःमुखी रुद्राक्ष धारण करने से मनुष्य की सोयी हुई शक्तियां जाग्रत होती हैं स्मरण शक्ति प्रबल होती है। और बुद्धि तीब्र होती है। यह रुद्राक्ष आत्मशक्ति, संकल्पशक्ति और ज्ञानशक्ति का दाता है।